ज़िन्दगी से वफ़ा कैसे करें
आँखों में आंसू,
गम के साए में घिरे ,
ज़िन्दगी क्या है,
है तो बस यूँ ही,
जैसे तैसे कट रही,
तन्हाइयों को समेटे हुए,
मंजिल के तलाश में,
कोई भटके यहाँ कोई भटके वहाँ
भटकते ही रह जाते हैं,
जो सही मंजिल न मिले,
जिनके बारे में हम इतना सोचे,
वो तो कुछ समझे ही नही,
तड़प कर हम रह जाते हैं
यादों को संजोये हुए,
ज़िन्दगी क्या है,
ज़िन्दगी एक सच है,
जो कोई समझे यहाँ,
सच्चाई का सामना करे,
ज़िन्दगी से वही वफ़ा करे.
-पूर्वा कुमारी

hi,
ReplyDeletei am really very pleased after reading your poems, ye purva kaha chuppi hue thi, aaj nayi purva ko dekh karm, i am happy & smiling.
ab tum bhi muskra sakti ho..........
actual m asali purva yahi h jo aapne abhi dekha....ye khubiya to bahut pahle se thi ji bus waqt k najakat hi kuch aisa tha....aage aap es purva ki khubiyon ko or achhe se jaan paenge.....
ReplyDeleteOne the best of my IIMC creation...
ReplyDeleteAfter long time I am rendering all things related my past life..
Kiranbala is my blog name..
Thanks Iimc..
छोटी सी गुड़िया, जादू की पुड़िया, कब बड़ी हो गई, पता न चला ।
ReplyDeleteआंखो के सपने, तन्हाईयों में समेटे हुए कब किसी प्यार के काबिल हो गए, पता न चला ।
रास्ते कठिन थे, हौसले बुलंद थे, कब तूफानों ने हमें रास्ता दे दिया, पता न चला ।
प्यार के आंगन में, कब किलकारिया गूंजने लगी पता न चला ।
समय चक्र कुछ ऐसे घूमा, साथ होकर भी कब अलग चलने लगे, पता न चला ।
कभी समझौता का नाम दिया तो कभी त्याग का, दुनियां जहां के रिश्ते निभाने लगे, पता न चला ।
समाज के संगत में, संस्कृतियों की रंगत में, कब जादू की गुड़िया सिसकने लगी, पता न चला ।
आंखो के सपने,कभी दिन के उजाले में तो कभी रात के अंधेरों में कब सिमटने लगे, इस दुनियां को पता न चला ।