छोटी सी गुड़िया, जादू की पुड़िया,
कब बड़ी हो गई, पता न चला ।
कब बड़ी हो गई, पता न चला ।
आंखो के सपने, तन्हाईयों में समेटे हुए
कब किसी प्यार के काबिल हो गए, पता न चला ।
दिल के अरमानों में, प्यार के आंगन में,
कब किलकारिया गूंजने लगी पता न चला ।
समय चक्र कुछ ऐसे घूमा, साथ होकर भी
कब अलग चलने लगे, पता न चला ।
कब अलग चलने लगे, पता न चला ।
कभी समझौता का नाम दिया तो कभी त्याग का,
दुनियां जहां के रिश्ते निभाने लगे, पता न चला ।
दुनियां जहां के रिश्ते निभाने लगे, पता न चला ।
समाज के संगत में, संस्कृतियों की रंगत में,
कब जादू की गुड़िया सिसकने लगी, पता न चला ।
कब जादू की गुड़िया सिसकने लगी, पता न चला ।
आंखो के सपने,कभी दिन के उजाले में तो कभी रात के अंधेरों में
कब सिमटने लगे, इस दुनियां को, पता न चला ।
कब सिमटने लगे, इस दुनियां को, पता न चला ।
तभी अंतरमन से आवाज आया, उठ तूझे किसका इंतजार है
अपने सपनो को पंख दे और उड़ जा इस जहां में ।
रास्ते कठिन थे, हौसले बुलंद थे,
कब तूफानों ने हमें रास्ता दे दिया, पता न चला ।
कब तूफानों ने हमें रास्ता दे दिया, पता न चला ।
अपने अस्तित्व की पहचान में अपने सपनों की उड़ान में
मैं फिर ऐसे उड़ी कि इस वक्त को भी, पता ना चला


